मेरे मुक्तक

 दो नेताओं के बीच चुनाव में लड़ाई हो गयी

खूब तू-तू मैं-मैं और जमकर हाथापाई हो गयी

दोनों एक-दूसरे पर जीभरकर किचड़ उछाला

इसी चक्कर में वहां नाले की सफाई हो गयी


ढोलक की थाप पे जब मन डोलने लगे

चकाचौंध ऐसी थी की गूंगे बोलने लगे

कल रात ही जन्मा था बच्चा पड़ोसी के यहाँ

सुबह आंगनवाड़ी वाले आकर तौलने लगे


बुजुर्गों की चाहत है तन पर खादी हो जाए

विवाहित चाहते है की तोंद आधी हो जाए

लड़कियां पढ़ने और आगे बढ़ने में लगी हैं

लड़के चाहते हैं किसी तरह शादी हो जाएं।


दिल की लगी बुझाने जा पहूंचा

बीमार मरीज दवाखाने जा पहूंचा

खेंच के जूता लड़की ने दे मारा

था बीमार वह दूजी पटाने जा पहूंचा


तुम्हें देखकर बहुत चाहत आती है

दिमाग काम न दे तो आफत आती है

न जाओ दूर मुझे कमजोर बनाकर

गाय के दूध से ही तो ताकत आती है


कैकयी ने कहा राम तेरा सही

मैं अकेली गल़त तू अकेला सही

मेरे वो दो वचन क्या मेरे ही है


सारे जग से बुराई भी ले लुंगी मैं


राम भक्त लवकुश को प्रिय जानकी

परिक्षा सभी देने को तैयार जानकी

तप त्याग प्रेम को समर्पित जीवन

न होगी ऐसी नार जैसी नार जानकी


पति वचन की खातिर जिद पे अड़ी

पेट में था गर्भ पर हृदय से थी बड़ी

रावण कु-दृष्टि भी न छू सकी जिसे

राम थे खड़े जहां सीता वही खड़ी


धनूष टूटा नहीं जब बड़े नाम से

सीता करती नमन गौरी-शिव धाम से

सिया शक्ति अब राम की भुजाओं में है

पल में टूटा धनूष राम के काम से


तेरा हाथों में जब हो हाथ फिर कुछ बात बन जाएं

तेरी जाने की जिद हो और तभी में रात हो जाएं

थोड़ा तुम कहों और मैं कहूं पर बात न बने

खुदा का हो करम और फिर तभी बरसात हो जाएं।


सात सुरों के संगम से संगीत बनता है

शब्द श्रृंगार संयोजन से तब गीत बनता है

मिलकर बिछड़ते है दुनिया में बहुत लोग

हृदय के तार छेड़े वो मनमीत बनता है


प्रिये तुम्हारे दर्शन को आतुर हैं मेरे नैन

हृदय स्पंदन तीव्र हुआ आठो पहर बैचैन

स्वागत रस प्रिय प्रेम का जरूरी है अब तो

अधरों फर धरों अधर मेरे न बीत जाये ये रैन



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