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Showing posts from February, 2021

हास्य मुक्तक

 हास (1) महिला कवि को देख मुसीबत में आ गये आयोजक भी थोड़ी शराफत में आ गये छोटा सा पेयमेन्ट जिन्हें ना मंजूर था ऐसे कवि श्रृंगार की चाहत में आ गये (2) प्रेम सागर में कितने नहाते रहे हम किनारे पे डुबकी लगाते रहे लड़कियां लड़कों की होती गयीं हम गीत और कविता ही गाते रहे (3) एक लड़की से हमको महोब्बत थी वो तो कितने ही लड़कों की चाहत थी नये तरीकों से उसको रीझाया मगर लड़के बदलने की उसको तो आदत थी (4) आराम है हराम वो एक बात कह गया दिन था मगर डर के पति रात कह गया बीवी से थी लड़ाई और पुलिस भी आ गयी हाथों से खाई मार मगर लात कह गया (5) प्रेम पत्र लड़की को देकर को आ गये कुछ लड़के गांव के जब शहर को आ गये शाम की चाय पर बुलाया लड़की ने दूरदर्शी लड़के दोपहर को आ गये (6) जेब से इक्ज़ाम वो का पर्चा खो गया खरीदने में जिसको लाखों खर्चा हो गया तांका झांकी में परिक्षा दिन निकल गया शिक्षक का बेटा फेल हुआ चर्चा हो गया (7) पापा से कहा बेटे ने मुझे प्यार हो गया शादी का मेरा सेहरा तो तैयार हो गया बोले पापा पहले तो पढ़ाई पूरी होगी रातो-रात छोरा-छोरी संग फरार हो गया (8) मां ने पूछा दूल्हे का क्या भाई ठीक है अच्छ...

गुमनाम आदमी को खब़र

 गुमनाम आदमी को-गीत गुमनाम आदमी को खब़र बना दिया ईंटों के मकान को तुने घर बना दिया गुमनाम आदमी को खब़र बना दिया... शौहर घर में है किसी शहंशाह की तरह ख्वाहिश पूरी हो रही बादशाह की तरह भूले बिसरे गांव को शहर बना दिया ईंटों के मकान को तुने घर बना दिया गुमनाम आदमी को खब़र बना दिया... पाई-पाई जमा कर खजाना बड़ा किया लड़खड़ाते जवान को पैरों पर खड़ा किया गली-चौराहे आवारा का मुकद्दर बना दिया ईंटों के मकान को तुने घर बना दिया... गुमनाम आदमी को खब़र बना दिया... जितेन्द्र शिवहरे 

गीत मेरे दिल के तेरे आर-गीत

 गीत मेरे दिल के तेरे-गीत गीत मेरे दिल के तेरे आर पार हो जायेंगे तुम मेरी हो जाना हम तेरे हो जायेंगे फूल भंवरें और तितली गीत गुनगुनायेंगे तुम मेरी हो जाना हम तेरे हो जायेंगे पवन बहे और युं कहे चलो साथ मेरे प्रिय तुम दूर सरीता के किनारे प्रेम नीर बहायेंगे नभ जो झूमे और चूमे वसुंधरा के आंचल को शीत ॠतु बरखा बहार हम दोनों नहायेंगे तुम जल्दी आ जाना हम कुछ देर से आयेंगे-2 गीत मेरे दिल के तेरे आर पार... उद्गार मुख से सुख और दुख से संबंधित हो जायेंगे नैन भीगेंगे तुम्हारे आसूं मेरे नैन बहायेंगे अठखेलियों में बैठ हम तेरे कैशतले सौ जायेंगे विलंब होगा लौटने में विलंब से ही हम जायेंगे गीत मेरे दिल के तेरे आर पार... जितेन्द्र शिवहरे

पंख लगा दो मुझको मैं उड़ना चाहती

 पंख लगा दो मुझको मैं उड़ना चाहती हूं-गीत  पंख लगा दो मुझको मैं उड़ना चाहती हूं पापा अभी और मैं पढ़ना चाहती हूं-2 धरती और आकाश नाप लेना चाहती हूं पापा अभी और मैं पढ़ना चाहती हूं पंख लगा दो मुझको मैं उड़ना चाहती हूं  शादी की है जिद क्यों नन्हीं सी मेरी उम्र है भोलापन है मुझसे दुल्हन सी कहां शर्म है-2 गुड्डे-गुड़ियों की शादी रचाना चाहती हूं पापा अभी और मैं पढ़ना चाहती हूं-2 पंख लगा दो मुझको मैं उड़ना चाहती हूं दूध का गिलास भैया जब पीता है रबड़ी रसमलाई खाता और जीता है मुंह में पानी आये मन दुःख जाता है आसूं बहते है नहीं देख कोई पाता है-2 पेटभर मिठाई इकदिन खाना चाहती हूं पापा अभी और मैं पढ़ना चाहती हूं पंख लगा दो मुझको मैं उड़ना चाहती हूं  छोटे भाई बहनों की देखभाल करती हूं गाय बकरी मुर्गी सभी को पालती हूं खेत चारा गोबर मन से कर जाती हूं कपड़ा बर्तन झाडू खाना बनाती हूं ये सब सारे खाम खुशी से करना चाहती हूं पापा अभी और मैं पढ़ना चाहती हूं  पंख लगा दो मुझको मैं उड़ना चाहती हूं भैया की तबीयत बिगड़े सेवा तुम करते हो चार ख्वाहिशे पूरी तुम उसकी करते हो-2 मैं एक दिन मन से बी...

भैया राजा राखी का उपहार चाहिये

भैया राजा राखी का उपहार चाहिये हर बहना का तुझसे सत्कार चाहिए-2 हर लड़की के अंग बिल्कुल मेरे जैसे है फिर क्यों तेरे सपने ऐसे वैसे है अपनी कुल मर्यादा पर विचार चाहिए हर बहना का तुझसे सत्कार चाहिए-2 भैया राजा राखी का उपहार चाहिये... हर लड़की जो तू यूं ही छेड़ा करेगा कोई लड़का क्या मुझे छोड़ा करेगा लड़की हो सुरक्षित समाचार चाहिए हर बहना का तुझसे सत्कार चाहिए-2 भैया राजा राखी का उपहार चाहिये... जितेन्द्र शिवहरे

सरस्वती मां सरस्वती

 सरस्वती मां सरस्वती-वंदना सरस्वती मां सरस्वती दे दो मां वर सरस्वती-2 दे दो इतना ज्ञान मांsss खुल सबकी अल्पमति दे दो वर सरस्वती-2 सरस्वती मां सरस्वती दे दो मां वर सरस्वती... ज्ञान बढ़ा दो मान बढ़ा दो कविता का सम्मान बढ़ा दो-2 श्रौता झूमेsss-2 जब मैं गाऊं इतना करना भगवती...मां सरस्वती दे दो वर सरस्वती-2 सरस्वती मां सरस्वती दे दो मां वर सरस्वती... कंठ विराजो आवाज़ दो शब्द निखारो संवार दो-2 विद्वानों कीsss-2 संगती करे हम जैसे सब मूढ़मति...मां सरस्वती दे दो वर सरस्वती-2 सरस्वती मां सरस्वती दे दो मां वर सरस्वती... आपस में भाईचारा रहे हर एक इंसां प्यारा रहे-2 भारत मेराsss-2 नित्य प्रति करता ही जाये प्रगति..मां सरस्वती दे दो वर सरस्वती--2 सरस्वती मां सरस्वती दे दो मां वर सरस्वती... सर्वाधिकार सुरक्षित --------------- जितेन्द्र शिवहरे

मैं दीवाना हो गया हूं आपका-गीत

 मैं दीवाना हो गया हूं आपका प्यार में पागल है जमाना आपका देख तुझे जमाना कुछ कहने लगा है देख तुझे कुछ-कुछ मुझे होने लगा है मिल जाये हम तुम ये कहना आपका प्यार में पागल है जमाना आपका मैं दीवाना हो गया हूं आपका देख पैरों में कहीं न मोच आ जाये रहा चलते गोरों की न सोच खो जाये दीवानो से मुश्किल से बच पाना आपका प्यार में पागल है जमाना आपका मैं दीवाना हो गया हूं आपका धूप में जब निकलो तो पर्दा गिरा लो रात मे जब निकलो तो पर्दा उठा लो शाम-सवेरे मुखड़ा दिखलाना आपका प्यार में पागल है जमाना आपका मैं दीवाना हो गया हूं आपका मिलना इक दिन तय है फिर रोते क्यों हो तुम दुनियां की बातों से आपा खोते क्यों हो तुम मत भूल शमा जिन्दा है परवाना आपका प्यार में पागल है जमाना आपका मैं दीवाना हो गया हूं आपका जितेन्द्र शिवहरे गीतकार 

वंदना

 मां शारदे मेरा नमन स्वीकार करे-वंदना मां शारदे मेरा नमन स्वीकार करे कंठ विराकर के... कंठ निराजकर हर दुविधा से पार करें मां शारदे मेरा नमन स्वीकार करे.... वाणी मेरी सत्य कहे ऐसा वर दे मां इष्टजनों की आशिष हो ऐसा घर दे मां अभिमान जब आकाश छूये तु पल में उतार दें.... मां शारदे मेरा नमन स्वीकार करे.... गीत कविता की गंगा युं ही बहती रहे साहित्य बिन है जग प्यासा हर आंखें कहती रहे जब-जब धरती पर पाप बड़े पुण्यों से उभार दे मां शारदे मेरा नमन स्वीकार करे चरणों में बैठे-बैठे नित्य नयी रचना हो उद्गार हो सब मन के ऐसी संरचना हो भव के भाव सागर में स्मृति अपार दे मां शारदे मेरा नमन स्वीकार करे जितेन्द्र शिवहरे

गीत-तुझे चाहता हूं कब से

 गीत-तुझे चाहता हूं कब से तुझे चाहता हूं कब से चाहे पूछ लेना सब से तेरे दिल में घर बनाऊंगा हां तुझे इतना चाहूंगा तुझे चाहता हूं कब से सावन की बूंदें भी देखो तरस रही-2 तुम्हें मुझसे मिलाने जमकर बरस रही तेरे आंगन ही में आकर तुझे डोली बिठाकर तुझे अपने झर ले जाऊंजा हां तुझे इतना चाहूंगा सूरज मूखी चे पूष्प तेरी ओर है तेरी सुन्दरता के चर्चे चारों ओर है बिंदियां माथे पर लगाकर गजरा बालों में सजाकर तुझे पलकों पर बैठाऊंगा हां तुझे इतना चाहूंगा तुझे चाहता हूं कब से मिलकर लिखेंगे प्रेम की एक नयी कहानी जहां मैं राजा हूं और तु है मेरे दिल की रानी धून कविता की सुनाकर माला शब्दों की बनाकर प्रेम गीतों को बहाऊंगा हां तुझे इतना चाहूंगा सर्वाधिकार सुरक्षित ---------------------- जितेन्द्र शिवहरे

गीत-धरापे मैं आई सजन तेरे लिये

 गीत-धरा पे मैं आई सजन तेरे लिये  धरा पे मैं आई सजन तेरे लिये भर के मेरी मांग सात फेरे लिये व्रत किये जप तप तेरे लिये-2 भर के मेरी मांग सात फेरे लिये। धरा पे मैं आई सजन तेरे लिये तुलसी का आंगना वो पीपल की छांव चीड़ीयों की चीं-चीं वो कव्वें की कांव-2 ससुरार अब मैका हुआ मेरे लिए भर के मेरी मांग सात फेरे लिये धरा पे मैं आई सजन तेरे लिये बिटियाँ का जन्म वो बेटे के पांव सासू ननद और देवर के भाव-2 छूप के आसूं पीती बलम तेरे लिये-2 भर के मेरी मांग सात फेरे लिये। धरा पे मैं आई सजन तेरे लिये भूल कोई हो तो भूला दीजो रुठ मैं जाऊं तो मना लीजो-2 सबकुछ मैं छोड़ आई तेरे लिये भर के मेरी मांग सात फेरे लिये धरा पे मैं आई सजन तेरे लिये सर्वाधिकार सुरक्षित  जितेन्द्र शिवहरे ----------------

गीत- सुन री सखी पिया मुझे

 गीत-सुन री सखी पिया मुझे  सुन री सखी पिया मुझे देखते नहीं दिन-रात काम पास बैठते नहीं-2 सांज और श्रृंगार भी मैं कर आऊं तो-2 दो पल को भी आंख सेंकते नहीं। तीज और त्यौहार में पास बुलाते इधर-उधर देखकर लौट ही जाते-2 लम्बी-लम्बी प्यार में अब फेंकते नहीं-2 मेरे पिया मुझको अब देखते नहीं... सुन री सखी पिया मुझे देखतें नहीं... ऑफिस के काम को घर ले आते कहूं कुछ बोलूं तो आंख दिखाते-2 मस्त मेरी आंखों में बहकते नहीं-2 मेरे पिया मुझको अब देखते नहीं... सुन री सखी पिया मुझे... मेके मुझे लेने जब-जब आये सास-ससूर साली में रम वो जाये-2 छुप के अब कलाईयां मरोड़ते नहीं-2 मेरे पिया मुझको अब देखते नहीं... सुन री सखी पिया मुझे... बच्चों बढ़ों की घर में आस है पूरी मेरी मनोकामना की प्यास अधुरी-2 बाजुओ में अपनी समटते नहीं-2 मेरे पिया मुझको अब देखते नहीं। सुन री सखी पिया मुझे... लगता है डर मुझे है कोई ओर जिसके जाल में है फंसा ये चित्तचौर-2 (क्योंकि) ज़िद के आगे घुटने मेरे टेकते नहीं-2 मेरे पिया मुझको अब देखते नहीं... मेरे पिया मुझको अब देखते नहीं... सुन री सखी पिया मुझे देखते नहीं... सर्वाधिकार सुरक्षित...

गीत-मुझे करती बहुत है प्यार

 गीत-मुझे करती बहुत है प्यार मुझे करती बहुत है प्यार बड़े महलों वाली पर मेरा है इंकार बड़े महलों वालो मुझे हुस्न का जादू दिखलाती दौलत शौहरत से बहकाती कभी बात-बात पर चिल्लाएं कभी आंख कर दिखाकर गुर्राती गुलाम नहीं तेरा यार बड़े महलों वाली तेरे जैसी मिलेंगी हजार बड़े महलों वाली मुझे करती बहुत है प्यार बड़े महलों वाली •••••••••• मुझे घर दामाद बनाने को आगे-पीछे दौड़ाने को मेरे पैरों में वो गिर जाती अपने पैरों में गिराने को खरीदना चाहे प्यार बड़े महलों वाली मेरा प्यार नहीं व्यापार बड़े महलों वाली मुझे करती बहुत है प्यार बड़े महलों वाली •••••••••• फूलों की सेज सजवाएं सच झुठे वादे फरमाएं और झूम-झूम के लहराती फिर नागीन जैसी बल खाएं बड़ी सुन्दर है तु यार बड़े महलों वाली कुछ मर्यादा तो विचार बड़े महलों वाली  सुन लाज शरम का गहना हो संस्कार का दामन पहना हो घर बड़ों का वो सम्मान करे चाहे घास-फूंस में रहना हो जिसका मीठा हो व्यवहार बड़े महलों वाली मुझे चाहिये वो दिलदार बड़े महलों वाली  मुझे करती बहुत है प्यार बड़े महलों वाली •••••••••• सर्वाधिकार सुरक्षित -------------------------- जितेन...

लिखो-कविता

*लिखो* लिखो! खूब लिखो बस लिखते रहो सुबह और शाम लिखो दिन और रात लिखो कोई पढ़े न पढ़े इस चिंता को छोड़कर सभी शंकाओं का त्यागकर कोई क्या कहेगा क्या सोचेगा इसे भूलकर  धुंआ धार लिखो इस पार लिखो उस पार लिखो इतना लिखो की कलम थक जाएं मगर तुम न थकना बार बार लिखो मिटा मिटा के लिखो कागज के पन्ने अलट पलट के लिखो घूम-घूम के लिखो झूम झूम के लिखो परेशान हो तो लिखो प्रसन्न हो तो लिखो लिख डालो मन की भावनाएं संवेदनाएं आशाएं और भविष्य के सपने यादें भी लिखना भुले बिसरे पलों को लिखना प्रेम के आनंदित क्षण लिखो रिश्ते नाते और परम्परा लिखो लिखो किसने दिल दुखाया रोया था तब किसने हंसाया परस्पर हर एक संवाद लिखो गीत गज़ल और कविता लिखो लिखो धरा और नभ के विषय में समुंद्र सरीता और वन के विषय में सौन्दर्य पर तो कितना लिखा जा सकता है प्रेमियों पर लिखो जुदाई पर लिखो दोनों का मिलन लिखो रूठना-मनाना और बेवफाई पर लिखो मां पर लिख सकती है ग़र कलम तुम्हारी तो स्वयं को धन्य समझना पिता का त्याग और समर्पण लिख सको तो लिखो बहन की राखी के धागे पर लिखो उसकी शादी और बिदाई पर लिखो स्कूल के रोचक किस्से पसंद के अध्यापक पर लिखो गली-म...

कविता-कौमार्य

 कौमार्य - कविता भुखे भेड़िए निकले थे एक रात शिकार करना था उन्हें बहुत बड़ा ऑफिस से लौटती हुयी एक नीरीह अबला हत्थे चढ़ गयी भुख-प्यास से व्याकुल घर त्वरित पहूंचने की लालसा में भूखों की भूख मिटायेगी वह पता नहीं था उसे कभी गिनती में वे चार-पांच थे उस पर काम का बोझ वो एक अकेली नारी थी उसने सामना करने की ठानी जी जान लगाकर भागना चाहा भागती भी कहाँ  तक पकड़ी गयी जल्दी ही बाहों में फिर जकड़ी गयी एक ने कमीज फाड़ दी कपड़े उसके बंट चूके थे कई हिस्सों में जिनके छिद्र शरीर का अंग दिखाने पर विवश थे वह छिपती रही उन दैत्यों की आंखों से मगर कब तक वस्त्रों ने शीघ्र ही उसका साथ छोड़ दिया वे जमींन की धुल चांट रहे थे छटपटाती उस नारी की हिम्मत टुटने को थी कोई नहीं था आसपास जो आकर बचाये उसे दरिन्दों की अट्टाहस से भरी हंसी उनका वो विजयी स्वर एक नारी की अस्मत लुटने का दंभ उन्हें मनुष्य से पृथक कर रहा था आंखों से बहते अश्रु अब रूक चुके थे गला रून्ध कर बैठ चूका था निढाल काया अब अमानुषों के हवाले थी बारी-बारी से उन्होंने भोग किया नारी का चित्कार और चीख नहीं थी वातावरण में एक बहुत बड़ा शुन्य और मौन था फैल...

गीत-इक बार मुस्कुरा दो

 गीत इक बार मुस्कुरा दो-3 तुम सावन के प्रिय बादल बनकर-2 बरखा प्रेम की गिरा दो इक बार मुस्कुरा दो-3 तुम्हारे मुस्कुराने से मुर्झाये खिल उठते है-2 जग सताये खिल उठते है, मौत आए खिल उठते है-2 हर कली-कली भी खिल उठेगी-2 तुम जरा सा इतरा दो इक बार मुस्कुरा दो-3 जो तुम मुस्कुरा दो मंद बाजार मुस्कुरा दे हर दरार मुस्कुरा दे हर किरदार मुस्कुरा दे जीत ली जिसने दुनिया भी तुम हंस के उसे हरा दो इक बार मुस्कुरा दो-3 जितेन्द्र शिवहरे 

मेरे मुक्तक

 दो नेताओं के बीच चुनाव में लड़ाई हो गयी खूब तू-तू मैं-मैं और जमकर हाथापाई हो गयी दोनों एक-दूसरे पर जीभरकर किचड़ उछाला इसी चक्कर में वहां नाले की सफाई हो गयी ढोलक की थाप पे जब मन डोलने लगे चकाचौंध ऐसी थी की गूंगे बोलने लगे कल रात ही जन्मा था बच्चा पड़ोसी के यहाँ सुबह आंगनवाड़ी वाले आकर तौलने लगे बुजुर्गों की चाहत है तन पर खादी हो जाए विवाहित चाहते है की तोंद आधी हो जाए लड़कियां पढ़ने और आगे बढ़ने में लगी हैं लड़के चाहते हैं किसी तरह शादी हो जाएं। दिल की लगी बुझाने जा पहूंचा बीमार मरीज दवाखाने जा पहूंचा खेंच के जूता लड़की ने दे मारा था बीमार वह दूजी पटाने जा पहूंचा तुम्हें देखकर बहुत चाहत आती है दिमाग काम न दे तो आफत आती है न जाओ दूर मुझे कमजोर बनाकर गाय के दूध से ही तो ताकत आती है कैकयी ने कहा राम तेरा सही मैं अकेली गल़त तू अकेला सही मेरे वो दो वचन क्या मेरे ही है सारे जग से बुराई भी ले लुंगी मैं राम भक्त लवकुश को प्रिय जानकी परिक्षा सभी देने को तैयार जानकी तप त्याग प्रेम को समर्पित जीवन न होगी ऐसी नार जैसी नार जानकी पति वचन की खातिर जिद पे अड़ी पेट में था गर्भ पर हृदय से थी बड़ी रा...

गीत-मुझे इकबार अकेले में

 गीत- मुझे इक बार अकेले में  तुझको पाना है कुछ बताना है न भूलाना है प्यार में सुन मैं क्या करूं, ठण्डी आहें भरू चाहती है क्या मरूं प्यार में मुझे इक बार अकेले में मोहब्बत से पुकारो न ये जीवन भी तुम्हारा है इसे आकर संवारो न तुम्हें जो प्यार करने की इजाजत मुझको मिल जाए तो क्या धरती क्या बादल ये सागर दिल मचल जाए अग़र थोड़ा गल़त भी हूं तो तुम आकर सुधारो न मुझे इक बार अकेले में मोहब्बत से पुकारो न यकीं मेरी मोहब्बत पे अग़र तुमको न हो तो तब बहारों और फिजाओ से हवा से पुछ लेना तब तेरी सांसों की खुशबू के नशे में हूं उतारो न मुझे इक बार अकेले में मोहब्बत से पुकारो न जितेन्द्र शिवहरे

गीत-मेरी पहली मोहब्बत हो तुम

 गीत-मेरी पहली मोहब्बत हो तुम मेरी पहली मोहब्बत हो तुम-2 दिल की लगी को बुझाऊं तो कैसे तेरे दिल में आकर जाऊं तो कैसे कि मेरी विरासत हो तुम मेरी पहली मोहब्बत हो तुम लरजती गरजती बरसती हो जैसे साजन को सजनी तरसती हो जैसे इठला के चलना बहकना महकना सहेली से अपनी वो चूग-चूग चहकना पलके जो झपके तो रात हो जाए बालों को झटके बरसात हो जाए समूंदर की गहराई दो आंखों में मोहब्बत मोहब्बत ही बातों में दीवाने की दावत हो तुम मेरी पहली मोहब्बत हो तुम जवां दिल जलों की धड़कती कहानी हर दिल बसे वो ख्वाबों की रानी खिड़की पे तेरी वो तांका झाकी छत पे वो कपड़े सुखाती गिराती पैरों से छम-छम मटकती जाएं गुलिस्तां की फूलों की खूशबू आये लरजते लबों को लाल किया है कुदरत ने कैसा कमाल किया है शरीफो पे आफत हो तुम मेरी पहली मोहब्बत हो तुम रातों में तारे उंगली से गिनना ख्वाबों में साजन की बाहों में खिलना घड़ी दो घड़ी में गुमसुम हो जाये अगले ही पल को तु मुस्कुराएं गालों पे इकदम नज़र टिके न गर्दन से नीचे नज़र रूके न कमसीन उमर है कहीं न फिसलना जुगनू है बहके सम्भल के चलना कस़म से कयामत हो तुम मेरी पहली मोहब्बत हो तुम मुझसे जो रूठ...

गीत- मेरे दिल में तुम

 गीत-मेरे दिल में तुम इस तरह समा जाओ  मेरे दिल में तुम इस तरह समा जाओ जितना भी जाऊं दूर उतना करीब आओ प्रेम लगन ये कैसी तुमने लगा दी है छूकर मेरे मन को ये आग बढ़ा दी है मेरे दिल में तुम तेरे प्रेम पत्र के शब्द मुझे कर जाते मौन और निशब्द तेरे आंगन की वो बगियां झर्र-झर्र बहती गांव की वो नदियां उस आंगन आने को मन तरसा करता है बिन तेरे दिल मेरा तड़पा करता है मेरे दिल में तुम अब करो न इतनी प्रशंसा हम तेरे है सबकी है अनुशंसा सभी रस्मे कसमें खाकर खूश है जीवन प्रीत की रीत निभाकर प्रेम लगन ये कैसी तुमने बढ़ा दी है छूकर मेरे मन को ये आग बढ़ा दी है मेरे दिल में तुम माथे पे चमके कुमकुम झूमके झूमे जैसे झूमे हम तुम दीवाने हो रहे पागल तेरे पैरों की बाज रही जो पायल होठों के मुहाने पर काला तिल जो है दिल बेचारे जूगनू का अब बचना मुश्किल है मेरे दिल में तुम इस तरह समा जाओ सर्वाधिकार सुरक्षित  जितेन्द्र शिवहरे कवि/लेखक 177 इंदिरा एकता नगर पूर्व रिंग-रोड मुसाखेड़ी इंदौर मध्यप्रदेश Mo. bo. 8770870151 7746842533 Jshivhare2015@gmail.com Myshivhare2018@gmail.com