गीत-मुझे करती बहुत है प्यार
गीत-मुझे करती बहुत है प्यार
मुझे करती बहुत है प्यार बड़े महलों वाली
पर मेरा है इंकार बड़े महलों वालो
मुझे हुस्न का जादू दिखलाती
दौलत शौहरत से बहकाती
कभी बात-बात पर चिल्लाएं
कभी आंख कर दिखाकर गुर्राती
गुलाम नहीं तेरा यार बड़े महलों वाली
तेरे जैसी मिलेंगी हजार बड़े महलों वाली
मुझे करती बहुत है प्यार बड़े महलों वाली
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मुझे घर दामाद बनाने को
आगे-पीछे दौड़ाने को
मेरे पैरों में वो गिर जाती
अपने पैरों में गिराने को
खरीदना चाहे प्यार बड़े महलों वाली
मेरा प्यार नहीं व्यापार बड़े महलों वाली
मुझे करती बहुत है प्यार बड़े महलों वाली
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फूलों की सेज सजवाएं
सच झुठे वादे फरमाएं
और झूम-झूम के लहराती
फिर नागीन जैसी बल खाएं
बड़ी सुन्दर है तु यार बड़े महलों वाली
कुछ मर्यादा तो विचार बड़े महलों वाली
सुन लाज शरम का गहना हो
संस्कार का दामन पहना हो
घर बड़ों का वो सम्मान करे
चाहे घास-फूंस में रहना हो
जिसका मीठा हो व्यवहार बड़े महलों वाली
मुझे चाहिये वो दिलदार बड़े महलों वाली
मुझे करती बहुत है प्यार बड़े महलों वाली
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सर्वाधिकार सुरक्षित
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जितेन्द्र शिवहरे
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