कविता-कौमार्य

 कौमार्य - कविता


भुखे भेड़िए निकले थे एक रात

शिकार करना था उन्हें बहुत बड़ा

ऑफिस से लौटती हुयी

एक नीरीह अबला हत्थे चढ़ गयी

भुख-प्यास से व्याकुल

घर त्वरित पहूंचने की लालसा में

भूखों की भूख मिटायेगी वह

पता नहीं था उसे कभी

गिनती में वे चार-पांच थे

उस पर काम का बोझ

वो एक अकेली नारी थी

उसने सामना करने की ठानी

जी जान लगाकर भागना चाहा

भागती भी कहाँ  तक

पकड़ी गयी जल्दी ही

बाहों में फिर जकड़ी गयी

एक ने कमीज फाड़ दी

कपड़े उसके बंट चूके थे

कई हिस्सों में

जिनके छिद्र शरीर का अंग दिखाने पर विवश थे

वह छिपती रही उन दैत्यों की आंखों से

मगर कब तक

वस्त्रों ने शीघ्र ही उसका साथ छोड़ दिया

वे जमींन की धुल चांट रहे थे

छटपटाती उस नारी की हिम्मत टुटने को थी

कोई नहीं था आसपास जो आकर बचाये उसे

दरिन्दों की अट्टाहस से भरी हंसी

उनका वो विजयी स्वर

एक नारी की अस्मत लुटने का दंभ

उन्हें मनुष्य से पृथक कर रहा था

आंखों से बहते अश्रु अब रूक चुके थे

गला रून्ध कर बैठ चूका था

निढाल काया अब अमानुषों के हवाले थी

बारी-बारी से उन्होंने भोग किया नारी का

चित्कार और चीख नहीं थी वातावरण में

एक बहुत बड़ा शुन्य और मौन था फैला हुआ

डरते-कांपते हाथों से नीचे पड़े वस्त्र उठाये

पहनकर चलने लगी वह एक नये सफ़र पर

जहां पुलिस और कचहरी उसकी प्रतिक्षा में थे

यही बलात्कार अब उसके साथ बार-बार होगा

लगातार होगा तब तक

जब तक उसे न्याय नहीं मिल जाता

अपराधी पकड़ में आयेंगे एक दिन

सज़ा भी होगी उन्हें

किन्तु उसकी अस़्मत

जो कितनी ही बार लूटी गयी

क्या वह उसे फिर मिलेगी?

उसका वो कौमार्य

क्या उसे वापिस मिलेगा?

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जितेन्द्र शिवहरे इंदौर मध्यप्रदेश

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