गुमनाम आदमी को खब़र

 गुमनाम आदमी को-गीत


गुमनाम आदमी को खब़र बना दिया

ईंटों के मकान को तुने घर बना दिया


गुमनाम आदमी को खब़र बना दिया...


शौहर घर में है किसी शहंशाह की तरह

ख्वाहिश पूरी हो रही बादशाह की तरह

भूले बिसरे गांव को शहर बना दिया

ईंटों के मकान को तुने घर बना दिया


गुमनाम आदमी को खब़र बना दिया...


पाई-पाई जमा कर खजाना बड़ा किया

लड़खड़ाते जवान को पैरों पर खड़ा किया

गली-चौराहे आवारा का मुकद्दर बना दिया

ईंटों के मकान को तुने घर बना दिया...


गुमनाम आदमी को खब़र बना दिया...


जितेन्द्र शिवहरे 

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