छंद

 छंद


दुःख के इस साल में

जिओ हर हाल में

साल ऐसे कितने ही

आयेंगे जायेंगे


मन का कोई मीत हो

हार हो या जीत हो

अपनी व्यथा कथा उसे

सुनेंगे सुनायेंगे


कष्टों की जेल हो

जीवन ही खेल हो

नियम में बंध हुये

तो भी मुस्कुरायेंगे


उम्मीदों का दामन भी

घिर आये सावन भी

छोटी मोटी खुशियों में

नाचेंगे गायेंगे।


प्रेम का समुन्दर भी लांघना पड़ा तो मैं

बनके कपी पर्वत उठा लाऊंगा

तेरे मात-पिता के श्रीचरणों में बैठकर 

अनुनय-विनय के गीत फिर गाऊंगा

भाई ने अनुज्ञा नहीं दी जो तेरे प्रियतमा

रुक्मणी की भांति विवाह से हर लाऊंगा

पुष्प प्रेम के पग पग तब खिलेंगे

प्रेम की पताका तेरे घर पे फहराऊंगा।


यहां-वहां घूमते है,

मस्ती में झूमते है

नशे की पुड़ियां हाथों

में रख चूमते है


सड़कों पर बड़ जाते

मंदिरों में अड़ जाते 

हाथ लात और ये

छाती में फिर लूमते है


चाट के ठेलों पर

होटलों के मेलों पर

लार टपका के 

मोटी आंखों से टूंगते है


कितना भी समझा लो

एक थाली में खिला लो

भीख ही मांगेगे

किसी की नहीं सूनते है।


प्रेषक-

जितेन्द्र शिवहरे 

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